Matdan Kendra Par Jhapaki (Hindi Edition) – Kedarnath Singh

₹125.00

1 in stock

SKU: 9789387462885 Categories: , ,
📚 We’re a little neighbourhood bookshop, and every order means the world to us. Preparing and shipping your books may take 1–2 working days. Thank you for supporting us with your patience and kindness. We’ll send you an email as soon as your books are on their way to you. ❤️

Description

ये कविताएँ एक कवि का पक्ष रखती हैं जिसे केदार जी इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में आकर पक्षहीन हो चुके हम लोगों को सौंप रहे हैं। ये कविताएँ हिंसा के विशाल परदे के आगे एक मनुष्य का हिंसक होने से इनकार हैं—देखने में बहुत विनम्र, विनीत, लेकिन चट्टान-सा सख़्त, दृढ़ और निर्णायक।

ज़रूरी नहीं कि उनकी सूची में हमारा नाम हो ही, जिनका नाम किसी सूची में नहीं, उनकी भी एक दुनिया है, जिसका नेतृत्व पेड़ करते हैं, और आपस में टकराते सत्ता के काले-पीले-सफ़ेद नारों के बरक्स जिसके पास पृथ्वी के सबसे सटीक और सबसे सुन्दर नारे हैं। वे नारे जो नदियों को उनका पानी, चींटियों को उनके बिल और आँखों को उनकी झपकी लौटा देने की पैरवी कर रहे हैं। इस संग्रह को पढ़ते हुए हमें इन रवहीन नारों की ताक़त का अहसास होता है।

केदार जी अब हमारे बीच नहीं हैं, उनकी कविताओं का यह संकलन एक वसीयत की तरह हमारे पास रहेगा जिसमें संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु, मनुष्यता की देखरेख की ज़िम्मेदारी वे हमें सौंप रहे हैं।

‘‘पृथ्वी के सारे ख़ून एक हैं/एक ही यात्रा में/एक ही पृथ्वी-भर लम्बी देह में/दौड़ रहे हैं वे/…अरबों धड़कनें एक ही लय में/घुमा रही हैं दुनिया को/ हर ख़ून हर ख़ून से बतियाता है।”

ये कविताएँ अपने सहज, निरायास आग्रह के साथ हमें ख़ून से बातें करते ख़ून की आवाज़ सुनने को कहती हैं। ”क्षमा करें भद्रजन/यदि फिर पूछ रहा हूँ/…मेरे देश के एक हाथ को/एक खुले हुए भूखे मुँह तक पहुँचने में/कितने बरस लगते हैं?’’ यह एक निर्दलीय प्रश्न है, लेकिन निरपेक्ष नहीं, यह मनुष्यता की आहत कोख में चीख़ता प्रश्न है; उम्मीद है हम इसका जवाब ढूँढ़ने का प्रयास करेंगे!

Additional information

Weight 0.12 kg

Reviews

There are no reviews yet.

Only logged in customers who have purchased this product may leave a review.